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Hindustani Gazlen

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Paperback

Literary CriticismGeneral Poetry

ISBN10: 8170284910
ISBN13: 9788170284918
Publisher: Rajpal & Sons
Published: Jan 5 2005
Pages: 242
Weight: 0.69
Height: 0.55 Width: 5.50 Depth: 8.50
Language: Hindi
ग़ज़ल के इतिहास में जाने की ज़रूरत मैं महसूस नहीं करता। साहित्य की हर विधा अपनी बात और उसे कहने के ढब से, संस्कारों से फ़ौरन पहचानी जाती है। ग़ज़ल की तो यह ख़ासियत है। आप उर्दू जानें या न जानें, पर ग़ज़ल को जान भी लेते हैं और समझ भी लेते हैं। जब 13वीं सदी में, आज से सात सौ साल पहले हिन्दी खड़ी बोली के बाबा आदम अमीर खुसरो ने खड़ी बोली हिन्दी की ग़ज़ल लिखी जब यार देखा नयन भर दिल की गई चिंता उतर, ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाय कर। जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया, हक्का इलाही क्या किया, आँसू चले भर लाय कर। तू तो हमारा यार है, तुझ पर हमारा प्यार है, तुझे दोस्ती बिसियार है इक शब मिलो तुम आय कर। जाना तलब तेरी करूं दीगर तलब किसकी करूं, तेरी ही चिंता दिल धरूं इक दिन मिलो तुम आय कर। तो ग़ज़ल का इतिहास जानने की ज़रूरत नहीं थी। अमीर खुसरो के सात सौ साल बाद भी बीसवीं सदी के बीतते बरसों में जब दुष्यंत ने ग़ज़ल लिखी कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए, कहाँ चिराग़ मय्यसर नहीं शहर के लिए। तब भी इतिहास को जानने की ज़रूरत नहीं पड़ी। जो बात कही गयी, वह सीधे लोगों के दिलो-दिमाग़ तक पहुँच गयी। और जब 'अदम' गोंडवी कहते हैं ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़रों में, मुस&

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