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Ghar Aur Bahar

Ghar Aur Bahar

Hardcover

General Poetry

ISBN10: 9367933452
ISBN13: 9789367933459
Publisher: Prabhakar Prakashan Private Limited
Published: Jul 24 2025
Pages: 226
Weight: 0.90
Height: 0.63 Width: 5.50 Depth: 8.50
Language: Hindi
हमारे घर के भोग-विलास के वातावरण में कम ही स्त्रियाँ, स्त्री का वास्तविक सम्मान पा सकी थीं। पर, शायद यही यहाँ का नियम है। इसीलिए शराब के प्यालों और नाचनेवालियों के घुँघरुओं की झंकार के नीचे, उनके जीवन की सारी रुलाई के डूब जाने के बावजूद, वे सिर्फ बड़े घर की घरनी का अभिमान सँजोए, किसी तरह अपना सिर ऊपर उठाए रख सकी थीं। पर, मेरे पति ने तो शराब को हाथ नहीं लगाया, और ना नारी-देह के लोभ में पाप के बाजार में मनुष्यता की थैली लुटाते हुए ही फिरे-यह क्या, मेरे गुण के कारण ? क्या, पुरुष के उद्घांत और उन्मत्त मन को वश में करने का कोई मंत्र विधाता ने मुझे दिया था? नहीं, यह सिर्फ मेरा सौभाग्य था, और कुछ नहीं। और मेरे घर की दूसरी औरतों की बेला ही विधाता को होश नहीं था कि उनके लिखे सारे अक्षर टेढ़े हो गए। शाम होते, ना होते ही उनके भोग का उत्सव समाप्त हो गया, केवल रूप-यौवन की बाती शून्य-भवन में सारी रात निरर्थक जलती रही। कहीं कोई संगीत नहीं, चारों ओर सिर्फ ज्वाला।

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